इनकम टैक्स की दरों में कटौती मत कीजिए


बड़ी कंपनियों द्वारा अदा किए गये इनकम टैक्स को कॉर्पोरेट टैक्स कहा जाता है। बीते समय में वित्त मंत्री ने कॉर्पोरेट टैक्स की दरों को 29-30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया। अब बड़ी कंपनियों द्वारा देश में अर्जित किए गये मुनाफे में से टैक्स कम देना होगा। तदनुसार उनके हाथ में अर्जित आय का अब 75 प्रतिशत हिंसा बचा रहेगा जोकि पूर्व में बच रहे 70 प्रतिशत से अधिक होगा। सोच थी कि कॉरपोरेट टैक्स घटने से कंपनियों के हाथ में आय अधिक रहेगी और वे निवेश जादा करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा है। देश में निवेश शिथिल ही पड़ा हुआ है।वास्तव में टैक्स में कटौती से निवेश में वृद्धि होना जरूरी नहीं है। निवेश करने का निर्णय मूल रूप से बाजार में मांग पर निर्भर रहता है। उनके हाथ में रकम है या नहींकृइससे कोई अंतर नहीं पड़ता है। जैसे यदि बाजार में मांग है और आप के द्वारा बनाए गए स्टील के बर्तन आसानी से बिक रहे हैं और आप सप्लाई कम कर पा रहे हैं लेकिन आपके पास निवेश करने के लिए रकम नहीं है तो आप ऋण लेकर भी फैक्ट्री लगाते हैं। बढ़ी हुई मांग की पूर्ति करने के लिए आप अधिक मात्रा में उत्पादन करते हैं और उस उत्पादन को आसानी से बाजार में बेच लेते हैं और अर्जित लाभ से ऋण को अदा कर देते हैं। इसके विपरीत यदि बाजार में मांग ना हो और आपके गोदाम में स्टील के बनें बर्तन भरे पड़े हो क्योंकि वे बिक नहीं रहे हो तब यदि आपके हाथ में रकम भी हो तो भी आप निवेश नहीं करते हैं। चूंकि मांग के अभाव में लगाई गई बर्तन की फैक्ट्री घटा देती है। देखा गया है कि तमाम ऐसे अवसर रहे हैं की महंगाई बढ़ रही होती है और टैक्स दरें भी अधिक होती हैं फिर भी उद्यमी निवेश करते हैं यदि बाजार में मांग रहती है। इसके विपरीत वर्तमान में महंगाई नियंत्रण में है, टैक्स दरें भी कम है फिर भी उद्यमी निवेश नहीं कर रहे हैं। ऐसे में टैक्स दरों को घटाने मात्र से निवेश नहीं बढ़ेगा। जैसे किसान को तय करना है कि नया ट्रैक्टर खरीदा जाये या नहीं। यदि उन्हें भरोसा है की सिंचाई होगी, सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध होगी और फसल की बिक्री हो जाएगी तो वह ट्रेक्टर में निवेश करेगा। यदि मंडी में सब्जी की मांग अधिक है तो वह ऋण लेकर भी ट्यूबवेल लगाया। इसके विपरीत यदि मंडी में आलू 5 रुपए प्रति किलो बिक रहा है तो वह आलू की खेती नही करेगा चाहे उसकी भूमि पड़ती ही क्यों न पड़ी रहे। इसी प्रकार जब उद्यमी को बाजार में मांग का भरोसा नहीं होता तब वह निवेश नहीं करता है। निवेश का निर्णय बाजार में मांग से होता है, न की निवेश के लिए पूंजी की उपलब्धता से। वित्त मंत्री ने जो कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की है उसके कारण सरकार के बजट में 1 लाख 45 हजार करोड़ रुपए की आय कम होगी। प्रश्न है कि इस रकम की भरपाई सरकार कहां से करेगी? इस रकम का भार अंततरू आम आदमी पर पड़ेगा। मान लीजिए कि सरकार जीएसटी में वृद्धि नहीं करती है और ऋ ण लेकर इस रकम की भरपाई कर लेती है। ऐसी स्थिति में ऋण पर जो ब्याज दिया जायेगा उसकी अदाएगी भी सरकार को करनी होगी। उस समय यह रकम आम आदमी पर येन केन प्रकारेण टैक्स लगाकर ही अर्जित की जाएगी। दूसरा उपाय है कि सार्वजनिक इकाइयों की बिक्री करके सरकार इस रकम को अर्जित कर सकती है। यह भी जनता पर ही बोझ होगा। पूर्व में जनता से वसूल की गई टैक्स से ये निवेश किए गए थे।यह बाप दादा द्वारा बनाई गई फिक्स डिपाजिट को तोडऩे जैसा है। इसके अलावा यह प्रक्रिया जादा दिन तक नहीं चल सकती है क्योंकि बाप दादा ने अनंत फिक्स डिपाजिट नहीं कराया था। एक सीमा के बाद आप सार्वजनिक इकाइयों की बिक्री करके टैक्स में कटौती की भरपाई नहीं कर पाएंगे। मूल बात यह है कि यदि सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की है तो तदनुसार आम आदमी से वसूले गए टैक्स में उतनी ही वृद्धि करनी पड़ेगी अथवा आम आदमी के लिए किए जाने वाले सरकारी खर्च जैसे मनरेगा, इंदिरा आवास, में कटौती करनी पड़ेगी। कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का अंतिम प्रमाण यह है कि बड़ी कंपनियों के हाथ में रकम अधिक है और आम आदमी के हाथ में रकम कम है। इस विरोधाभासी चाल का अर्थव्यवस्था पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ेगा। कारण यह की आम आदमी के हाथ में रकम कम बचने से उसकी क्रय शक्ति कम हो रही है और बाजार में स्टील के बर्तन की मांग कम हो रही है। तदनुसार आम उद्यमी के साथ-साथ बड़ी कंपनियों द्वारा भी निवेश कम किया जा रहा है। कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती को इसलिए किया गया था कि बड़ी कंपनियों के हाथ में रकम बढ़ेगी और वे निवेश करेंगे लेकिन इसका प्रभाव ठीक इसके विपरीत होता दिख रहा है। निवेश शिथिल पड़ा हुआ है और बड़ी कम्पनियां मौज उड़ा रही हैं।मांग उठ रही है कि आने वाले बजट में व्यक्तियों द्वारा अदा किए जा रहे इनकम टैक्स में कटौती की जाये। इस कटौती का प्रभाव बिलकुल उसी प्रकार का होगा जैसा पूर्व में कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का हुआ है। इससे भी अमीरों के हाथ में रकम बढ़ेगी लेकिन इसका निवेश कम होने की ही संभावना है क्योंकि आम आदमी के ऊपर टैक्स का बोझ बढ़ेगा, उसकी क्रय शक्ति घटेगी और बाजार में मांग नहीं बनेगी। वित्त मंत्री को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को पुनरू पटरी पर लाने के लिए इनकम टैक्स में कटौती की घातक नीति से परहेज करें और आम आदमी की आय में वृद्धि के उपाय ढूंढे जिससे कि आम आदमी के हाथ में क्रय-शक्ति बढ़े और वह बाजार में माल को खरीदे जिससे कि बड़ी कंपनियों को और अमीर लोगों को निवेश करने को प्रोत्साहन मिले।


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