महात्मा गांधी के 150वें जयंती वर्ष के बीच पडऩे वाले गणतंत्र दिवस और उनकी पुण्यतिथि को वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त महत्व मिल गया है। यह बेहद विलक्षण संयोग और अवसर है कि बापू की प्रासंगिकता यकायक और बढ़ गई है। जिस फीनिक्स के नाम पर उन्होंने वर्षों पहले दक्षिण अफ्रीका में एक आश्रम की स्थापना कर अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा किया था, उसी पौराणिक पक्षी की तरह गांधी आज अपनी ही राख से वापस जीवित हो रहे हैं। अगर हम 30 जनवरी, 1948 की शाम 5रू17 की याद करें जब एक तरह से दुनिया थम सी गई थी। विश्व स्तब्ध था परंतु वह बापू की ही शिक्षा थी कि देश ने अपने आप को संभाला और संयम से काम लिया। पूरी दुनिया के देशों के झंडे आधे झुका दिए गए थे तथा एकाएक पूरी मानवता उनके योगदान का स्मरण करने लगी थी। देश और दुनिया अपनी चाल से आगे बढ़ती रही। जीवन के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन होते गए और प्रारंभ के कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो स्वयं भारत का जनजीवन, नीति-रीति, कार्यक्रम और जीवन प्रणाली धीमे-धीमे गांधीवादी विचारधारा और उनके द्वारा बतलाए गए रास्ते से हटती चली गई। आजादी के तुरंत पश्चात कुछ साल तो गांधी का असर था लेकिन भारत द्वारा अपनाए गए यूरोपीय समाजवाद ने जहां एक ओर देश को आत्मनिर्भर बनाया वहीं गांधी की अवधारणा के अनुरूप समाज रचने में हमारे नीतिकारों व राजनैतिक नेतृत्व के सामने रास्ता कठिन होता चला गया। जीवन के विविध दृष्टिकोणों से देखें तो गांव व शहर, खेती बनाम उद्योग, संयम विरूद्ध संचय, सादगी के खिलाफ दिखावे को बढ़ावा मिलने लगा। इसके चलते भारत के लोगों में गांधीवादी मूल्यों का क्षरण होता चला गया। नैतिकता की बजाय अनैतिकता को मौन समर्थन, ईमानदारी की बजाय बेईमानी और ऐसे ही असंख्य विकार हमारे निजी और सार्वजनिक जीवन में समाहित होते चले गये। इस कार्यपद्धति ने हमारे जनजीवन को इस तरह से प्रदूषित करना शुरू किया कि सर्वत्र अनैतिकता का बोलबाला होने लगा। इसके बावजूद भारत में निश्चित रूप से वह धड़ा भी छोटे-मोटे आकार में ही क्यों न हो हमेशा मौजूद था जिसकी आवाज कभी वैसी मुखर नहीं रही पर गांधी से प्रेरित और उनके सामाजिक विचारों की वह आग्रही रही। वह मौन रहकर गांधी को विभिन्न नैतिक झंझावातों से बचाकर अपने भीतर सहेजता रहा। शायद यही कारण हो कि 30 जनवरी की शाम जिस व्यक्ति ने बापू के सीने पर 3 गोलियां उतारी थीं, उसकी मातृ संस्था और अनुषांगिक संगठनों के विरोध के बाद भी गांधी नाम की मशाल हमेशा जीवित रही है। गांधी को सतही तौर पर जानने-समझने वालों ने उन्हें दकियानूसी और चरखा-तकली तक सीमित रखने की कोशिश की। उनका उपहास उड़ाया गया तथा चरित्र लांछन भी खूब हुआ।लगभग तभी से समाज की कुछ शक्तियां गांधी का विरोध करती रहीं जब उन्होंने अहिंसक, नैतिकता आधारित और सर्वसमावेशी स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत की। ये ताकतें गांधी के न केवल तौर-तरीके के खिलाफ थीं बल्कि जिस तरह के समाज की अवधारणा गांधी ने निर्मित की थी, उससे भी वे इत्तेफाक नहीं रखती थीं। गांधी कल्पित समाज का आधार स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व है जो उस वर्ग के लिए अस्वीकार्य रहा है जो सामाजिक विभाजन और सांप्रदायिकता को अपने विचारों का मूल आधार बना चुके हैं।
सदियों से चल रही इस परंपरा और वर्ण व्यवस्था को पहली चुनौती एक तरह से गांधी ने ही दी थी जिसे वे आजाद भारत की बुनियाद बनाना चाहते थे। धीरे-धीरे गांधी विरोधी शक्तियां समाज में ताकत बटोरती रहीं। भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक अवाम ने इन शक्तियों को लंबे समय तक उभरने नहीं दिया लेकिन पिछले 3-4 दशकों में देश की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियां इस प्रकार बदलीं कि गांधी विरोधी व्यक्तियों और संगठनों के मुफीद वातावरण बनता चला गया। वर्तमान निजाम की पहली पारी में ऐसी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली सत्तारूढ़ पार्टी ने जल्दी ही रंग दिखाने शुरू किए। उसके जनविरोधी निर्णयों का उद्देश्य देश में पूंजीवाद को बढ़ावा देना था और इसके लिए आक्रामक राष्ट्रवाद तथा धर्मान्धता का सहारा लिया गया। गांधीवादी विचारधारा के एकदम विपरीत जहां एक ओर देश की संपदा को कुछ लोगों की जेबों में भरा जाने लगा वहीं दूसरी ओर मुठ्ठी भर लोगों को पहले से ज्यादा अमीर बनाने की प्रक्रिया अपनाकर सत्तानशीनों ने गांधी के समतामूलक सामाजिक अवधारणा को छिन्न-भिन्न करना शुरू किया। इसके साथ ही सर्व धर्म समभाव की बजाय सांप्रदायिक विभाजन तथा धु्रवीकरण को सामाजिक और राजनैतिक एजेंडा बना लिया गया। इसने सरकार की सभी आर्थिक मोर्चों पर होने वाली नाकामयाबियों को भी ढंकने का काम किया। दूसरी पारी में यह ताकत बड़ा बहुमत लेकर लौटी है। इस बहुमत का उपयोग और बहाना वह अपनी मर्जी का समाज रचने में कर रही है। बहुत कम समय में उसने ऐसे निर्णय लिए जो समाज को वर्गीकृत करते हैं, आर्थिक गैर बराबरी को बढ़ावा देते हैं तथा देश की तरक्की को नियोजित ढंग से रोककर लोगों को सभी तरीके से कमजोर कर रहे हैं। राजनैतिक शक्ति को अपने हाथों में रखने के लिए उसका केन्द्रीकरण किया जा रहा है जो लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। जनता की उपेक्षा और उससे संवादहीनता के कारण अलग-अलग मुद्दों पर लगातार पनपते असंतोष को रास्ता मिला युवा और छात्र शक्ति के परिसरों में यानी विश्वविद्यालयों से। शिक्षा को लगातार महंगा कर निचले वर्ग को उससे वंचित करने की चाल जब लोगों को समझ में आई तो वे लामबंद होने लगे। इस बीच नागरिकता संशोधन कानूनों ने बता दिया कि यह सरकार संविधान की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रही है। वह समानता की जगह पर गैर बराबरी वाला समाज बनाना चाहती है जिसमें एक वर्ग का प्रभुत्व हो। लोगों की नागरिकता पर सवालिया निशान लगाकर उन्हें राजनैतिक रूप से अस्तित्वहीन बनाने का बड़ा खेल खेला जा रहा है। ऐसे वक्त में जब हमारे सारे राजनैतिक सिद्धांत इस ताकत के आगे बेकार साबित होने लगे थे तथा लोगों को कोई राह नहीं सूझ रही थी तो एक तरह से अपने आप भारत ने देश के सबसे बड़े जननायक गांधी की ओर रुख किया है। विभिन्न देशों में प्रचलित एक दंतकथा के मुताबिक फीनिक्स एक ऐसा पक्षी है जो जलने के बाद अपनी राख से वापस जिंदा हो जाता है। गांधी का मूल सूत्र अहिंसक सत्याग्रह आज फिर से देश इस्तेमाल में ला रहा है। तमाम शासकीय हथकंडों और उसके समर्थकों द्वारा इन आंदोलनों में हिंसा फैलाने की हो रही कोशिशों को सत्याग्रही निष्फल कर रहे हैं। वे खुद को सरकार द्वारा की जा रही प्रताडऩा और दमन के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। कागज नहीं दिखाएंगे का नारा सविनय अवज्ञा की वापसी का परिचायक बन गया है। जिस गांधी को लोग बैठे ठाले लाना चाहते थे, वे जनता के द्वारा सायास वापस बुलाये जा रहे हैं। आज चाहे समाज की जीवनशैली बदल चुकी हो और उसका ऊपरी आवरण अलग दिख रहा हो, पर यह साबित हो गया है कि भारत की अंतरात्मा में गांधी हमेशा से विद्यमान रहे हैं।
फीनिक्स की तरह अपनी राख से जीवित होते महात्मा गांधी